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कभी AI हमें हैरान करता है, कभी डराता है—सही दिशा मिली तो तरक्की, वरना असमानता और जोखिम।
AI कोई एक दिन का जादू नहीं है। 1956 में डार्टमाउथ कॉलेज से इसकी यात्रा शुरू हुई। उस दौर में कंप्यूटर छोटे-छोटे काम—गिनती, गेम—तक सीमित थे। इंटरनेट, बिग डेटा और तेज़ कंप्यूटिंग के साथ AI ने रफ्तार पकड़ी। आज यह हमारे फोन, गाड़ियों और अस्पतालों तक पहुँच चुका है।
IIT जैसे संस्थानों में AI ने रिसर्च की दिशा बदल दी—डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, रोबोटिक्स मेनस्ट्रीम हैं। पर एक चुनौती भी है: कई छात्र टूल-डिपेंडेंट हो रहे हैं, जिससे originality और practical skills पर असर पड़ सकता है। संतुलन ही कुंजी है—AI को सहायक की तरह, सहारे की तरह नहीं।
सबसे ज़्यादा असर उन्हीं पर होगा जिनकी नौकरियाँ नियम-आधारित और दोहराव वाली हैं—छोटे दुकानदार, ड्राइवर, डेटा-एंट्री या बेसिक सपोर्ट रोल्स। समय रहते तैयारी नहीं हुई तो बेरोज़गारी और असमानता बढ़ेगी। इसलिए सरकार, संस्थान और हम—तीनों को मिलकर स्किल-अपग्रेड और सुरक्षित नीतियों पर काम करना होगा।
AI चमत्कार भी है और चेतावनी भी। सही दिशा मिली तो यह उत्पादकता और तरक्की का इंजन बनेगा; नियंत्रण और जिम्मेदारी के बिना यही तकनीक भरोसा, प्राइवेसी और रोजगार के लिए खतरा बन सकती है। समाधान सरल है— सीखते रहो, अपडेट रहो, और तकनीक को इंसान-केंद्रित रखो।
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