मुंबई: 7 जुलाई 2006 को मुंबई लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के 18 साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी 12 मुस्लिम आरोपियों को बरी कर दिया है। जस्टिस अनिल किलोर और श्याम चांडक की खंडपीठ ने राज्य सरकार और दोषियों की अपीलों पर 6 महीने तक सुनवाई के बाद यह निर्णय लिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ठोस सबूत देने में विफल रहा और गवाहों की गवाही अविश्वसनीय थी।
11 जुलाई 2006 को शाम के व्यस्त समय में मुंबई की सात लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 189 लोगों की जान गई और 800 से ज्यादा घायल हुए। यह भारत के इतिहास की सबसे भीषण आतंकी घटनाओं में से एक था।
2015 में मौत की सजा पाए आरोपी:
उम्रकैद की सजा पाने वाले अन्य 7 आरोपी:
इन सभी आरोपियों ने बीते 18 साल जेल में बिताए। इस दौरान उन्होंने अपनी बेगुनाही की लड़ाई लड़ी। अब कोर्ट के इस फैसले ने उनके जीवन को नई दिशा दी है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या यह न्याय है जो बहुत देर से आया?
यह फैसला भारत की न्याय प्रणाली के लिए एक उदाहरण है कि कैसे सबूतों और निष्पक्ष सुनवाई के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट करता है कि आतंकवाद जैसे मामलों में सही जांच और प्रमाण कितने आवश्यक हैं, ताकि निर्दोष को सजा ना मिले और दोषी छूट ना पाए।
⚠️ नोट: यह रिपोर्ट न्यायिक फैसले और कोर्ट रिकॉर्ड पर आधारित है। यदि किसी जानकारी में संशोधन या सुधार की आवश्यकता हो, तो कृपया हमें सूचित करें।
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