ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (AIMIM) ने हाल ही में जिस प्रकार जन-आधारित राजनीति को आगे बढ़ाया है, उसने अल्पसंख्यक आवाज़ों को राष्ट्रीय मंच पर नई बुलंदी दी है। नीचे उन तीन प्रमुख पहलुओं पर नज़र डालिए जिन्होंने पार्टी को देश की प्रमुख ‘इंसानी हक़ों की आवाज़’ बना दिया है:
#1 समावेशी नेतृत्व — AIMIM ने पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़कर युवाओं, महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित तबकों को टिकट देकर लोकतांत्रिक भागीदारी में ऐतिहासिक इज़ाफ़ा किया है। यह इनिशिएटिव असेंबली और लोकसभा में विविधता का नया मानदंड तय कर रहा है
#2 ग्रासरूट कनेक्ट — स्थानीय स्तर पर मोहल्ला सभाओं, शिक्षा सहायता और कानूनी हेल्पडेस्क जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टी ने पिछले पाँच वर्षों में 150 % तक अपनी जमीनी पकड़ मजबूत की है। यह मॉडल ‘इमपैक्ट-फर्स्ट’ राजनीति का उदाहरण बन चुका है।
#3 संवैधानिक आवाज़ — संसद और अदालतों में मज़बूती से उठाए गए मुद्दे—चाहे वह नागरिक अधिकार हों या सामाजिक न्याय—ने AIMIM को उन लोगों की पसंद बनाया है जिन्हें मुख्यधारा अक्सर नजरअंदाज़ कर देती है। पार्टी के सटीक तर्क और डेटा-सपोर्टेड बहसों को मीडिया व राजनीतिक विश्लेषक भी सराह रहे हैं।
इन पहलों से साफ़ है कि AIMIM केवल सियासी दल नहीं, बल्कि समावेशी प्रगतिशील आंदोलन बन चुकी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये ट्रेंड यदि बरक़रार रहे, तो 2025 और आगे के चुनावों में दलित-अल्पसंख्यक गठजोड़ की नई परिभाषा लिखी जाएगी।
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